भास्कर स्टिंग: गांव-गांव में तलाशी जाती थीं गर्भवती महिलाएं, चाय की दुकानों पर ही हो जाते थे बच्चों के सौदे
छोटा उदेपुर, आलीराजपुर से लौटकर सिद्दि व्यास, समीर जानी, संजय भाटिया. करीब 28 हजार की आबादी वाला छोटा उदेपुर। इसी कस्बेनुमा शहर में है केसर अस्पताल, जिसे लोग केसर आश्रम भी कहते हैं। अस्पताल को आश्रम मानने वाली वो दो तरह की महिलाएं हैं, जिनके बूते यह अस्पताल हर महीने लाखों रुपए कमा रहा है। एक वो महिलाएं हैं जो प्रेम संबंधों के चलते गर्भवती होती हैं और इस अनचाहे बच्चे से छुटकारा दिलाने का काम ये केसर अस्पताल करता है। अस्पताल ऐसे बच्चों को जन्म दिलवाता है और फिर उसे अपने पास रख लेता है। दूसरी वो महिलाएं हैं जिनके यहां शादी के बरसों बाद भी संतानें नहीं होती। ये अस्पताल ऐसी महिलाओं को ये बच्चा बेच देता है। पैसा दोनों तरह की महिलाओं से भरपूर लिया जाता है। इसके लिए बकायदा एजेंट बने हुए हैं।
अस्पताल में काम करने वाले सफाईकर्मी से लेकर नर्स और मैनेजर तो हैं ही, अस्पताल के बाहर चाय की दुकानों पर भी इनके एजेंट घूमते रहते हैं। गर्भवती महिला या औलाद चाहने वाली महिलाओं को अस्पताल लाने के लिए प्रति महिला इन्हें 4 से 5 हजार रुपए कमीशन मिलता है। अस्पताल से बच्चे बिकने की जानकारी बाहर आने के बाद अब तक 27 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें अस्पताल का प्रमुख डॉ. राजू नदार भी शामिल है। 13 बच्चे बरामद भी किए जा चुके हैं। लेकिन जिस तरह से यहां नेटवर्क चल रहा था, उसके आगे ये खुलासे बहुत छोटे थे।
पूरे गिरोह को बेनकाब करने के लिए दिव्य भास्कर के तीन रिपोर्टर ने यहां 7 दिन तक इन्वेस्टिगेशन की। गुजरात और मध्यप्रदेश के 2 जिलों के 9 गांवों तक इसके तार खंगाले। तस्करी से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े 55 लोगों का स्टिंग किया। इसके बाद जो जानकारियां मिली, वो बेहद चौंकाने वाली थी। पढ़िए किस किरदार की क्या भूमिका थी, कैसे फंसाते थे खरीदारों को, कैसे काम करते थे दलाल और किस तरह एक अस्पताल बन गया नवजात बच्चों की मंडी.
डॉक्टर राजू आदिनारायण नाडार। उम्र 47 साल। बच्चे बेचने वाले अस्पताल का मुखिया और मुख्य सरगना। फिलहाल जेल में है। राजू नाडार मूल रूप से कन्याकुमारी का। पिता वडोदरा आ गए थे तो ये भी चला आया। बड़ौदा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री ली। फिर 1999 से 2003 तक छोटा उदयपुर के एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करने लगा। बाद में केसर नाम से खुद का अस्पताल खोल लिया। सरकार की बाल कल्याण योजनाओं में पंजीकरण भी करा लिया।
डॉ. राजू अस्पताल के स्टाफ के जरिए बच्चों की खरीदी करता था। इसके एजेंट छोटा उदयपुर ही नहीं, आलीराजपुर और आसपास के गांवों में फेले हुए थे। गिरोह इतना मजबूत कि आलीराजपुर समेत आसपास के अन्य निजी-सरकारी अस्पतालों से भी डिलीवरी के लिए महिलाओं को केसर अस्पताल जाने का सुझाव दिया जाता था। यही वजह है कि हर महीने यहां औसतन 300 से 400 डिलीवरियां होती थी। ख्याति ऐसी फैली कि 2016 में गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदी बेन इन्हें सम्मानित भी कर चुकी हैं।
कैसे तलाशी जाती थीं मांएं?
इनके गिरोह की सदस्य रह चुकी सरिता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि हमारी नजर ऐसी महिलाओं पर होती थी जो गर्भवती दिखती थीं। हम इनसे मिलते थे और बात-बात में पता करते थे कि ये अनचाहे बच्चे की मां है या नहीं? यानी प्रेम संबंधों या अन्य अवैध कारणों से मां बनी महिलाओं नजर रहती थी।
सरिता के मुताबिक, आदिवासी बेल्ट में महिलाएं गर्भपात नहीं कराती हैं। डॉक्टर भी गर्भपात के मामले बहुत कम लेते हैं। सामाजिक मजबूरी-बंदिश और डर ये वो कारण हैं जिनकी वजह से महिलाएं ऐसे बच्चे को रखना नहीं चाहतीं। ऐसी महिलाओं से उनका नवजात बच्चा लेने के लिए पहले सौदेबाजी होती। डील फाइनल होने के बाद उन्हें डॉक्टर राजू से मिलाया जाता था। डॉक्टर राजू खुद उन्हें भरोसा दिलाता था कि तुम्हारा नाम, पता सब गुप्त रहेगा और बच्चे की झंझट से भी मुक्ति भी मिल जाएगी। डिलीवरी के बाद बच्चा हमें सौंप देना। इस काम के बदले तुम्हें सिर्फ 10 से 15 हजार रुपए देने होंगे।
गर्भवती महिला के अस्पताल में भर्ती होने के बाद पूरा अस्पताल स्टाफ उसकी देखरेख में जुटा रहता था। सफाईकर्मी से लेकर नर्स और मैनेजर तक। महिला का कोई रिश्तेदार अगर मिलने भी आता तो पहले उसकी पूरी जन्मकुंडली पता की जाती थी।
कैसे तलाशे जाते थे खरीदार?
सलमा (बदला हुआ नाम) केसर हॉस्पिटल के एनआईसीयू विभाग की इंचार्ज थीं। सलमा ने बताया मैंने समदानी मेमण को अवैध रूप से बच्चा दिलवाया था। वहीं हॉस्पिटल की एक और स्टाफ रमीला ने बताया कि उसने भी अपने भाई को एक बच्चा दिलवाया था। गिरोह से जुड़े लोगों ने बताया कि जान पहचान या अन्य संपर्कों से हम पता करते थे कि किसी को बच्चा चाहिए या नहीं। फिर हम उसे छोटा उदयपुर बुलाते।
अस्पताल के आसपास चाय की दुकान पर उसके साथ डील करते थे। इसके बाद बच्चे की डिलीवरी दे दी जाती थी। ऐसे बच्चों का अस्पताल में कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। बर्थ सर्टिफिकेट भी यह कहकर बनवा लिए जाते थे कि डिलीवरी घर पर हुई है। जिस दिन बच्चा बेचा जाता था, उसी को उसकी जन्म तारीख भी मान ली जाती थी।
ऐसे पकड़ाया सबसे बड़ा दलाल
बच्चों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा दलाल था शैलेंद्र राठौर। मूलत: अलीराजपुर का धन्नासेठ भूमाफिया है। वहां इसके करीबियों के शराब के ठेके भी हैं। शैलेन्द्र के नेटवर्क की जड़ें बहुत गहरी हैं। अवैध रूप से संतान सुख पाने वाले लोगों के बीच ये ‘बाबाजी’ के नाम से भी पहचाना जाता है। एमपी के एक एनजीओ चलाने वाले प्रशांत दुबे को सबसे पहले इसकी जानकारी मिली थी।
प्रशांत ने आलीराजपुर की PSI चंचला सोनी के साथ मिलकर इस रैकेट का भंडाफोड़ किया। प्रशांत ने चंचला सोनी को अपनी पत्नी बताकर शैलेंद्र से संपर्क किया। 4-5 महीने तक फोन पर ही संपर्क होता रहा और शैलेंद्र टालता रहा। फिर एक दिन शैलेंद्र का फोन आया- आपको कितने दिन? महीने का बच्चा चाहिए? शैलेन्द्र ने खुद 15 महीने का बच्चा देने की तैयारी बताई। दीपावली के बाद नवंबर में बच्चे की सुपुर्दगी और पैसे के लेनदेन की बात पक्की हुई। 2.50 लाख में बच्चा देने की बात शुरू कर अंतत: 1.70 लाख रुपए में शैलेन्द्र ने बात पक्की की।
इसमें भी जन्मप्रमाण पत्र न बन पाने के चलते शैलेन्द्र ने 30 हजार खुद ही कम कर दिए। तय समय पर शैलेंद्र ने प्रशांत से कहा कि पैसे लेकर आ जाओ। साथ में दूध की बोतल, डायपर और बच्चे के लिए दो जोड़ी कपड़े भी लेते आना। ट्रैप वाले दिन दोपहर 12 बजे प्रशांत और चंचला शैलेन्द्र द्वारा बताई गई जगह पर पहुंचे-तो वहां दो लोगों ने पूछताछ की। इनके वहां से रवाना होने के बाद शैलेन्द्र खुद एक गली से बुलट पर सवार होकर आया। अपने घर पर ले गया। दूसरी मंजिल पर बैठाकर बातचीत की। फिर नीचे से बच्चा मंगवाया। प्रशांत-चंचला उपलब्ध करवाए गए बच्चे के साथ फोटो खींच रहे थे। साथ में शैलेन्द्र की पत्नी भी थी।
पूर्व योजना के अनुसार बच्चा हाथ आते ही रूमाल लहरा कर इशारा करते ही अलीराजपुर पुलिस के विशेष दल ने मूख्य सूत्रधार के घर को घेर लिया। ट्रैप वाले दिन मुख्य सूत्रधार के घर प्रशांत के अलावा अन्य चार लोग भी बच्चा खरीदने की चाहत के साथ पहुंचे थे। शैलेन्द्र को उपलब्ध करवाए गए बच्चे और चिंहित की गई नोटों के साथ गिरफ्तार किया गया। इस पूरे ऑपरेशन को मप्र की अलीराजपुर पुलिस ने इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया कि स्थानीय छोटा उदेपुर की पुलिस तक को भनक नहीं लग पाई। इसके बाद केसर हॉस्पिटल के रिकॉर्ड, रजिस्टर को जब्त करने की कार्रवाई की गई। तब जाकर लोकल पुलिस को पता चला।
अस्पताल में काम करने वाले सफाईकर्मी से लेकर नर्स और मैनेजर तो हैं ही, अस्पताल के बाहर चाय की दुकानों पर भी इनके एजेंट घूमते रहते हैं। गर्भवती महिला या औलाद चाहने वाली महिलाओं को अस्पताल लाने के लिए प्रति महिला इन्हें 4 से 5 हजार रुपए कमीशन मिलता है। अस्पताल से बच्चे बिकने की जानकारी बाहर आने के बाद अब तक 27 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें अस्पताल का प्रमुख डॉ. राजू नदार भी शामिल है। 13 बच्चे बरामद भी किए जा चुके हैं। लेकिन जिस तरह से यहां नेटवर्क चल रहा था, उसके आगे ये खुलासे बहुत छोटे थे।
पूरे गिरोह को बेनकाब करने के लिए दिव्य भास्कर के तीन रिपोर्टर ने यहां 7 दिन तक इन्वेस्टिगेशन की। गुजरात और मध्यप्रदेश के 2 जिलों के 9 गांवों तक इसके तार खंगाले। तस्करी से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े 55 लोगों का स्टिंग किया। इसके बाद जो जानकारियां मिली, वो बेहद चौंकाने वाली थी। पढ़िए किस किरदार की क्या भूमिका थी, कैसे फंसाते थे खरीदारों को, कैसे काम करते थे दलाल और किस तरह एक अस्पताल बन गया नवजात बच्चों की मंडी.
डॉक्टर राजू आदिनारायण नाडार। उम्र 47 साल। बच्चे बेचने वाले अस्पताल का मुखिया और मुख्य सरगना। फिलहाल जेल में है। राजू नाडार मूल रूप से कन्याकुमारी का। पिता वडोदरा आ गए थे तो ये भी चला आया। बड़ौदा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री ली। फिर 1999 से 2003 तक छोटा उदयपुर के एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करने लगा। बाद में केसर नाम से खुद का अस्पताल खोल लिया। सरकार की बाल कल्याण योजनाओं में पंजीकरण भी करा लिया।
डॉ. राजू अस्पताल के स्टाफ के जरिए बच्चों की खरीदी करता था। इसके एजेंट छोटा उदयपुर ही नहीं, आलीराजपुर और आसपास के गांवों में फेले हुए थे। गिरोह इतना मजबूत कि आलीराजपुर समेत आसपास के अन्य निजी-सरकारी अस्पतालों से भी डिलीवरी के लिए महिलाओं को केसर अस्पताल जाने का सुझाव दिया जाता था। यही वजह है कि हर महीने यहां औसतन 300 से 400 डिलीवरियां होती थी। ख्याति ऐसी फैली कि 2016 में गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदी बेन इन्हें सम्मानित भी कर चुकी हैं।
कैसे तलाशी जाती थीं मांएं?
इनके गिरोह की सदस्य रह चुकी सरिता (बदला हुआ नाम) ने बताया कि हमारी नजर ऐसी महिलाओं पर होती थी जो गर्भवती दिखती थीं। हम इनसे मिलते थे और बात-बात में पता करते थे कि ये अनचाहे बच्चे की मां है या नहीं? यानी प्रेम संबंधों या अन्य अवैध कारणों से मां बनी महिलाओं नजर रहती थी।
सरिता के मुताबिक, आदिवासी बेल्ट में महिलाएं गर्भपात नहीं कराती हैं। डॉक्टर भी गर्भपात के मामले बहुत कम लेते हैं। सामाजिक मजबूरी-बंदिश और डर ये वो कारण हैं जिनकी वजह से महिलाएं ऐसे बच्चे को रखना नहीं चाहतीं। ऐसी महिलाओं से उनका नवजात बच्चा लेने के लिए पहले सौदेबाजी होती। डील फाइनल होने के बाद उन्हें डॉक्टर राजू से मिलाया जाता था। डॉक्टर राजू खुद उन्हें भरोसा दिलाता था कि तुम्हारा नाम, पता सब गुप्त रहेगा और बच्चे की झंझट से भी मुक्ति भी मिल जाएगी। डिलीवरी के बाद बच्चा हमें सौंप देना। इस काम के बदले तुम्हें सिर्फ 10 से 15 हजार रुपए देने होंगे।
गर्भवती महिला के अस्पताल में भर्ती होने के बाद पूरा अस्पताल स्टाफ उसकी देखरेख में जुटा रहता था। सफाईकर्मी से लेकर नर्स और मैनेजर तक। महिला का कोई रिश्तेदार अगर मिलने भी आता तो पहले उसकी पूरी जन्मकुंडली पता की जाती थी।
कैसे तलाशे जाते थे खरीदार?
सलमा (बदला हुआ नाम) केसर हॉस्पिटल के एनआईसीयू विभाग की इंचार्ज थीं। सलमा ने बताया मैंने समदानी मेमण को अवैध रूप से बच्चा दिलवाया था। वहीं हॉस्पिटल की एक और स्टाफ रमीला ने बताया कि उसने भी अपने भाई को एक बच्चा दिलवाया था। गिरोह से जुड़े लोगों ने बताया कि जान पहचान या अन्य संपर्कों से हम पता करते थे कि किसी को बच्चा चाहिए या नहीं। फिर हम उसे छोटा उदयपुर बुलाते।
अस्पताल के आसपास चाय की दुकान पर उसके साथ डील करते थे। इसके बाद बच्चे की डिलीवरी दे दी जाती थी। ऐसे बच्चों का अस्पताल में कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। बर्थ सर्टिफिकेट भी यह कहकर बनवा लिए जाते थे कि डिलीवरी घर पर हुई है। जिस दिन बच्चा बेचा जाता था, उसी को उसकी जन्म तारीख भी मान ली जाती थी।
ऐसे पकड़ाया सबसे बड़ा दलाल
बच्चों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा दलाल था शैलेंद्र राठौर। मूलत: अलीराजपुर का धन्नासेठ भूमाफिया है। वहां इसके करीबियों के शराब के ठेके भी हैं। शैलेन्द्र के नेटवर्क की जड़ें बहुत गहरी हैं। अवैध रूप से संतान सुख पाने वाले लोगों के बीच ये ‘बाबाजी’ के नाम से भी पहचाना जाता है। एमपी के एक एनजीओ चलाने वाले प्रशांत दुबे को सबसे पहले इसकी जानकारी मिली थी।
प्रशांत ने आलीराजपुर की PSI चंचला सोनी के साथ मिलकर इस रैकेट का भंडाफोड़ किया। प्रशांत ने चंचला सोनी को अपनी पत्नी बताकर शैलेंद्र से संपर्क किया। 4-5 महीने तक फोन पर ही संपर्क होता रहा और शैलेंद्र टालता रहा। फिर एक दिन शैलेंद्र का फोन आया- आपको कितने दिन? महीने का बच्चा चाहिए? शैलेन्द्र ने खुद 15 महीने का बच्चा देने की तैयारी बताई। दीपावली के बाद नवंबर में बच्चे की सुपुर्दगी और पैसे के लेनदेन की बात पक्की हुई। 2.50 लाख में बच्चा देने की बात शुरू कर अंतत: 1.70 लाख रुपए में शैलेन्द्र ने बात पक्की की।
इसमें भी जन्मप्रमाण पत्र न बन पाने के चलते शैलेन्द्र ने 30 हजार खुद ही कम कर दिए। तय समय पर शैलेंद्र ने प्रशांत से कहा कि पैसे लेकर आ जाओ। साथ में दूध की बोतल, डायपर और बच्चे के लिए दो जोड़ी कपड़े भी लेते आना। ट्रैप वाले दिन दोपहर 12 बजे प्रशांत और चंचला शैलेन्द्र द्वारा बताई गई जगह पर पहुंचे-तो वहां दो लोगों ने पूछताछ की। इनके वहां से रवाना होने के बाद शैलेन्द्र खुद एक गली से बुलट पर सवार होकर आया। अपने घर पर ले गया। दूसरी मंजिल पर बैठाकर बातचीत की। फिर नीचे से बच्चा मंगवाया। प्रशांत-चंचला उपलब्ध करवाए गए बच्चे के साथ फोटो खींच रहे थे। साथ में शैलेन्द्र की पत्नी भी थी।
पूर्व योजना के अनुसार बच्चा हाथ आते ही रूमाल लहरा कर इशारा करते ही अलीराजपुर पुलिस के विशेष दल ने मूख्य सूत्रधार के घर को घेर लिया। ट्रैप वाले दिन मुख्य सूत्रधार के घर प्रशांत के अलावा अन्य चार लोग भी बच्चा खरीदने की चाहत के साथ पहुंचे थे। शैलेन्द्र को उपलब्ध करवाए गए बच्चे और चिंहित की गई नोटों के साथ गिरफ्तार किया गया। इस पूरे ऑपरेशन को मप्र की अलीराजपुर पुलिस ने इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया कि स्थानीय छोटा उदेपुर की पुलिस तक को भनक नहीं लग पाई। इसके बाद केसर हॉस्पिटल के रिकॉर्ड, रजिस्टर को जब्त करने की कार्रवाई की गई। तब जाकर लोकल पुलिस को पता चला।
Comments
Post a Comment